टिक्की वाले सरदार जी
सर्दियों की खुशनुमा सुहावनी सर्द शाम । पीछे के कमरे में रखे इकलौते पलंग पर कॉपी किताबें ले मैं पढ़ने में तल्लीन थी कि अचानक पूरी फिजा मनभावन आकर्षक खुशबू से महक उठी। कॉपी किताब ताक पर रख खिड़की से गली में झांकती मेरी उत्सुक आँखों ने देखा कि सरदार जी अपनी साईकिल पर एक बक्सा सा जमाए जोरदार आवाज लगाते हुए हमारी गली से निकल रहे थे टिक्कीsssssss गर्मागर्म टिक्कीsssss ! जाने उस आवाज में आकर्षण था कि टिक्की की अद्भुत खुशबू में! ध्यान बरबस ही उस ओर खिंचा चला जाता । तभी पड़ोस के कुछ बच्चे टिक्की लेने धमक पड़े । अब सरदार जी ठीक हमारे दरवाजे के आगे खड़े थे। सरदार जी ने तीन चार कागज एक के ऊपर एक जमाए, उस पर गर्मागर्म टिक्की रखी, झट से उसे दो फाड़ खोला! धुंए की लहरों के साथ तेज खुशबू पूरे वातावरण को चीरती हुई सीधे मेरे नथुनों में समा गई । अरे देखो ! आलू मटर और दाल कैसे टुकुर टुकुर बाहर झाँकने लगे। सरदार जी ने उस पर हल्का सा मसाला बुरका, इससे पहले कि आलू बेचारे कुछ समझ पाते पुदीने धनिये हरी मिर्च की तीखी चटनी छपाक से उस पर पड़ी और फिर उस हरी चटनी पर गुड़ की लाल चटनी! हरे लाल चटख रंगों ने टिक्की की ख...